Monday, 20 March 2017
Thursday, 2 March 2017
जो हासिल हुआ था हमसफ़र (Jo hasil hua tha Humsafar )
वो खो गया इसी शहर की शक्ल में ....!!
कांच के ख्वाब टूटे तो हुआ मालूम ,
हर बार खुदा नहीं होता पत्थर की शक्ल में...!
ऐसा नहीं कि घर ना सजे तेरी गैरमौजूदगी में,
पर कुछ कमी सी रहती है इस घर की शक्ल में....!
तू ही जान तेरे सीने की गहराई में छुपा था क्या ,
मुझे मुहब्बत लगता था ऊपर ऊपर की शक्ल में....!
जीते रहने की दुआ देने से पहले याद रहे 'चारस' ,
मरना उन्हें भी पड़ा जो आये पैगम्बर की शक्ल में...!
Saturday, 17 December 2016
बारिश रुक नहीं सकती (Barish ruk nahi sakti)
चल घर से निकलते हैं
कुछ हौसला करते हैं ,
बारिश रुक नहीं सकती
तो बारिश में घुला करते हैं।
चेहरों के नहीं दाग मन के
इस धुन में धुला करते हैं।
मंज़िल न सही हमराही मगर
रास्तों पर मिला करते हैं।
ज़ेहन में अनगिनत जेब में चन्द,
हम आ रहे हैं
ख्वाहिशों को इत्तिला करते हैं।
बयान उसकी मुश्किल का सुन लेना 'चारस',
उधेड़बुन में अक्सर
लोग खुला करते हैं।
Tuesday, 1 November 2016
ThiS Is What My DiAry Says
For me writing is a basic need, more like food and sleep. It gives me strength , energy and inspiration.
People get new clothes and accessories to look adorable. I write a poem or two and if I find them good I admire myself every time I read them (I actually do) and I live in this effect for next few days.
Yes, there are days when thoughts just overflow but there are some too when I am short of ideas, imagination, tired and exhausted.
As it has happened a few times by now I gave a thought to post this.
Actually someone gifted me this notebook a couple of years ago. I make use of it whenever I get a chance.
There are times when I have to reconsider my writing style, expressions, content, standards, public interest, relevance and so on...
Not always it is pleasing. Not even once.
" Being natural never goes out of style. Never fails to impress. It's an element you effortlessly identify with, and is an intrinsic part of you. "
These lines have saved me a few times and sorted my self-doubt. Its much easier to play myself than any others.
Not only in writing these have relevance in every aspect of our lives.
Being natural is the simplest thing one can do, for it is real you.
Saturday, 22 October 2016
ख़ून सना था लिबास मेरा(khoon sana tha libas mera)
1.
जुबां भी मैंने पाई , चुप भी रहना था,
जन्नत भी मुझे जाना था ,झूठ भी कहना था।
ग़ज़लें पाट दी दुनियादारी को कोसते
जब तक रुख ज़िन्दगी तय ना था।
दुनिया की दोस्ती कबूल पड़ी करनी ,
आखिर..... इसी में रहना था।
2.
दिल टूटने का गम संभल गया,
अभी जुदाई का दर्द भी सहना था।
चोट सहेजने का खज़ाना था ,
हँसी नुमाइश का गहना था।
शुरुआत पे इश्क़ की कुल मिलाकर ,
बस इतना ही कहना था।
ख़ून सना था लिबास मेरा
मैंने रंग समझ जिसे पहना था।
क्यों लिखता है बेफिज़ूल बातें
चारस तू ऐसा कतई ना था।
तकलीफ को लफ़्ज़ों का सहारा लेकर
कलम से रिसते रहना था।
Sunday, 28 August 2016
क़यामत की वो रात(QYAMAT KI WO RAAT)
बेजान दिलों तक पे शिकन तसव्वुर ले आया उसका ,
वो जो नरमदिल थे ,अंजाम उनका क्या हुआ ? माशा-अल्लाह !
लफ़्ज़ों को खींच दिया सबने भाषणों की तरह बेतहाशा ,
पहले भी कई बार था हर लफ्ज़ सुना हुआ। माशा-अल्लाह !
कई दिनों से रूठा है हमारी छत पर से चाँद,
हमने रक्खा है उसे गैरों में देखा हुआ। माशा-अल्लाह!
ख़ुदा ने भर दी उसमें शायरी की हर एक अदा ,
जिसने भी देखा कह उठा ,माशा-अल्लाह !माशा-अल्लाह!
नसीब हुआ तो उनको जो शोर मचाया करते थे ,
मेरी शराफत का ये खूब सिला हुआ , माशा-अल्लाह !
क़यामत की वो रात दिल छू गयी 'चारस ',
वो जो नरमदिल थे ,अंजाम उनका क्या हुआ ? माशा-अल्लाह !
लफ़्ज़ों को खींच दिया सबने भाषणों की तरह बेतहाशा ,
पहले भी कई बार था हर लफ्ज़ सुना हुआ। माशा-अल्लाह !
कई दिनों से रूठा है हमारी छत पर से चाँद,
हमने रक्खा है उसे गैरों में देखा हुआ। माशा-अल्लाह!
ख़ुदा ने भर दी उसमें शायरी की हर एक अदा ,
जिसने भी देखा कह उठा ,माशा-अल्लाह !माशा-अल्लाह!
नसीब हुआ तो उनको जो शोर मचाया करते थे ,
मेरी शराफत का ये खूब सिला हुआ , माशा-अल्लाह !
क़यामत की वो रात दिल छू गयी 'चारस ',
पहली बार देखा हमने ,हुस्न को रोता हुआ।माशा-अल्लाह !
Wednesday, 24 August 2016
मुल्क बनाने का काम चल रहा है (Mulk banane ka kaam chal raha hai)
पहाड़ पिस रहे हैं
कहीं मैदान जल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है
बस्तियाँ बसने लगीं, लोग उजड़ने लगे हैं ,
मैंने सुना है हम आगे बढ़ने लगे हैं।
नदियाँ कस दी गईं ,सरहदें खींच दीं गईं ,
कान ढक लिए गए ,आँखें मींच दी गईं ,
मन है कि फिर भी बेतहाशा मचल रहा है,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
सामान महँगा हुआ जाता है
ईमान सस्ता,
पहले कभी देखा नहीं गया इतना इंसान सस्ता ,
दो पल के आराम के लिए लग रहा
उम्र भर का सुकून दांव पर ,
चपल - चालाक शहर भारी पड़ रहे
सीधे-सादे गाँव पर,
हालात बदलते हमने नहीं देखे
हाँ !
बर्ताव ज़रूर बदल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
इतनी भीड़, मारामारी ,
जहाँ देखो सर ही सर ,
कि बामुश्किल ही नसीब है आधा-पौना सा घर ,
उधर मंदिरों में बैठे पत्थर ऐश में,
इधर सड़कों पर घूम रहे बेरोज़गार तैश में ,
पारा चढ़ रहा है ,लावा पिघल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
कहीं मैदान जल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है
बस्तियाँ बसने लगीं, लोग उजड़ने लगे हैं ,
मैंने सुना है हम आगे बढ़ने लगे हैं।
नदियाँ कस दी गईं ,सरहदें खींच दीं गईं ,
कान ढक लिए गए ,आँखें मींच दी गईं ,
मन है कि फिर भी बेतहाशा मचल रहा है,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
सामान महँगा हुआ जाता है
ईमान सस्ता,
पहले कभी देखा नहीं गया इतना इंसान सस्ता ,
दो पल के आराम के लिए लग रहा
उम्र भर का सुकून दांव पर ,
चपल - चालाक शहर भारी पड़ रहे
सीधे-सादे गाँव पर,
हालात बदलते हमने नहीं देखे
हाँ !
बर्ताव ज़रूर बदल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
इतनी भीड़, मारामारी ,
जहाँ देखो सर ही सर ,
कि बामुश्किल ही नसीब है आधा-पौना सा घर ,
उधर मंदिरों में बैठे पत्थर ऐश में,
इधर सड़कों पर घूम रहे बेरोज़गार तैश में ,
पारा चढ़ रहा है ,लावा पिघल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
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