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Wednesday, 24 August 2016

मुल्क बनाने का काम चल रहा है (Mulk banane ka kaam chal raha hai)

पहाड़ पिस रहे हैं
कहीं मैदान जल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है

बस्तियाँ बसने लगीं, लोग उजड़ने लगे हैं ,
मैंने सुना है हम आगे बढ़ने लगे हैं।

नदियाँ कस दी गईं  ,सरहदें खींच दीं गईं ,
कान ढक लिए गए ,आँखें मींच दी गईं ,

मन  है कि फिर भी बेतहाशा मचल रहा है,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।

सामान महँगा हुआ जाता है
ईमान सस्ता,
पहले कभी देखा नहीं गया इतना इंसान सस्ता ,

दो पल के आराम के लिए लग रहा
उम्र भर का सुकून दांव पर ,
चपल - चालाक शहर भारी पड़ रहे
सीधे-सादे  गाँव पर,

हालात बदलते हमने नहीं देखे
हाँ !
बर्ताव ज़रूर बदल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।

इतनी भीड़, मारामारी ,
जहाँ देखो सर ही सर ,
कि बामुश्किल ही नसीब है आधा-पौना सा घर ,

उधर मंदिरों में बैठे  पत्थर ऐश में,
इधर सड़कों पर घूम रहे बेरोज़गार तैश में ,

पारा चढ़ रहा है ,लावा पिघल रहा है ,
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।
मुल्क बनाने का काम चल रहा है।




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