मैं नहीं ऐसा कि आनाकानी करूँ,
या फिर ज़ुबान से अपनी फिरूँ....!
दुनिया को बाद में दूंगा सलाह,
अपने घर की पहले दरार भरूँ....!
लोगों का छाती पीटना देख,
चाहता हूँ एक रोज़ के लिए मरुँ....!
बेशक लाओ मुहब्बत का तोहफा,
गनीमत है ना डरूँ.......!
उसके क़दमों पर ही फबते दोनों,
एक से हैं मैं और घुँघरू .........!
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