Saturday, 3 October 2015

किनारों से (KINARO SE)

अनाम सोच की गोद पर सिर रखने से ,
अमूमन धुँधला ही सही ,याद आता है वो।

जहाँ सर्द रातों की ठंडक नहीं पहुँच पाती ,
शक्ल में धड़कन की सीना थपथपाता है वो।

मलाल उसको नहीं अपनी ज़िन्दगी से कुछ ,
मैं सच कहता हूँ ,झूठ बोल जाता है वो।

आप देखिये नाम मेरा लेकर एक दफा ,
और देखिये चेहरे क्या क्या बनाता है वो।

हमेशा की आगाज़ की बातें लोगों के बीच ,
इतनी शिद्दत से अंजाम छुपाता है वो।

साहिलों के बूते नहीं इलाज लहरों का अब ,
उसका नाम 'चारस' ,किनारों से घबराता है वो। 

Sunday, 14 June 2015

अक्स आईने में

अक्स आईने में आजकल आपके आते हैं ,
अक्सर जब हम खुद को अकेला पाते हैं। 

आसान नहीं अंदेशा अंदरूनी असलियत का
अमूमन अंदर से लोग अफ़लातून कहलाते हैं। 

अबके आसमाँ अगर अमावस की आरज़ू को अड़ा ,
चांदनी चेहरे से चुरा आपके चाँद को दे आते हैं।

सुकून और सजा साथ साथ , सरफ़िरों को सौगात
अजूबे ही अल्हड आशिक़ी को अमल में लाते हैं।
 
आखिर अल्फ़ाज़ अलावा आपके और कोई कैसे बने 
आप आ आ कर अंजुमन में अफ़साने अर्ज़ कराते हैं।
(अंजुमन -महफ़िल )
अलग-अलग आदत और अदा आदमी की आज भी है 
आज भी आदमी को अल्लाह से ज्यादा आदमी आजमाते हैं।

Tuesday, 19 May 2015

रूह का

नमकीन आँसू फर्श पर लेटे,
दो-चार पलकों ने समेटे।

जाने हुआ फिर  क्या,
रोते-रोते हँसना पड़ा ,
याद में उनकी ..
खातिर जिनकी तरसना पड़ा ,

किसी गैर मंज़िल का
अरमान कर बैठे ,
बिन चले पैरों का
नुकसान कर बैठे,

नमकीन आँसू फर्श पर लेटे,
दो-चार पलकों ने समेटे।

नरम पड़ते देखा उनको
जब उन्हें ज़रूरत मेरी हुई,
फिर भी सबके सामने
शक्ल बदसूरत मेरी हुई ,

उन्हें पाना जितना मुश्किल
भूलना हमें वो उतना ही
आसान समझ बैठे ,
जिनके ख्याल है दिल बेचैन ..
हम रूह का
इत्मीनान समझ बैठे ,

नमकीन आँसू फर्श पर लेटे,
दो-चार पलकों ने समेटे।

Saturday, 9 May 2015

तल्ख़ी आपकी

निढ़ाल हुआ चाँद भी तल्ख़ी से आपकी ,
दौड़ी आई चाँदनी शक्ल लेने लिबास की।

मनमर्ज़ियों की शोख़ियाँ अर्ज़ियाँ सब टाल कर,
किसके लिए रखे हुए हो खुद को सँभाल कर,

वक़्त से पहले टंगे तारे , टोह लेने जनाब की,
और तू समझा 'चारस ',सिर्फ तूने नींदें ख़राब की।

हालाँकि उम्र इतनी नहीं कि फ़ायदा -नुकसान लो,
नीयत खिदमतगारों की  मगर ज़रा पहचान लो,

हुस्न बने फूल तो लुटे खुशबू बाग़ की,
गर बने काँटा तो चुगे मछलियाँ तालाब की।

Saturday, 2 May 2015

अरमान सिर्फ इतना

तुम मुकर जाओ ना , प्यार मुझसे निभाया जा नहीं सकता ,
एक खानाबदोश ज़िन्दगी लेकर घर बसाया जा नहीं सकता।

तुम दिल तोड़ोगे मेरा , मैं कुचल जाऊंगा किसी और का ,
इस दलदल में किसी को ,बेवफा होने से बचाया जा नहीं सकता।

अरमान सिर्फ इतना कि ज़िंदा रहते मशहूर हो जाएँ ,
राहत इज़्ज़त जन्नत , मरकर क्या कुछ कमाया जा नहीं सकता।

दो-चार ग़ज़ल लिख कर मुफलिसी-मुहब्बत पर 'चारस' ,
आवाम के दिलों से चाह कर भी ग़ालिब चुराया जा नहीं सकता।

Monday, 27 April 2015

वास्ता-ए -ग़ज़ल

क़बूल करके चल पड़े , निभाएगा कौन?
आंच इश्क़ की जल पड़े , बुझाएगा कौन?

सुरमई सी धुन ,नाज़ुक सा वो गीत जिससे
नींदों में न खलल पड़े ,गाएगा कौन?

एक मर्ज़ ,जिसकी एक दवा ,सैंकड़ों सलाहें ,
जिनका असर असल पड़े , बताएगा कौन?

बच्चों की तरह सहमूं दुनिया के शोर से,
माथे पे मेरे बल पड़े , बहलाएेगा कौन?

ताकि आँखों से शायरी और होंठों से
वास्ता -ए - ग़ज़ल पड़े , शरमाएगा कौन?

वो रात करवा-चौथ की,भूख से निढ़ाल ,
चाँद जल्दी निकल पड़े , बड़बड़ाएगा कौन?

दैत्य

  दैत्य   झुँझलाहट की कोई ख़ास वजह नहीं सुना सकूँ इतना ख़ास हादसा भी नहीं , नुचवा लिए अब ख़्वाबों के पंख नहीं यहाँ तक कि...