Wednesday, 12 June 2019
Friday, 25 January 2019
Wednesday, 28 November 2018
कहाँ जैसे ? (Kahan jaise?)
कहाँ जैसे?
बन तू जाता है एहसास मेरा,
कब तुझे आता है होश
मेरे बारे में
जब फिरता है दिन दुनिया भुलाये सारे में
कहाँ जैसे पुकारती है सोच
नाम मेरा
कहाँ जैसे?
नज़र वापिस आती है
रास्ता भुलाने का डर
तुझे नहीं आता क्या
कोई साया बढ़कर पीठ नहीं खटखटाता क्या
नहीं होता क्या धुंधला घर
राह बिछड़ते हुए ज़रा सी साँस तो घबराती है
कहाँ जैसे?
बहाता है आँसू, किसके पास
या सचमुच ही तू पथराया
जब बोलकर जाता है अभी आया
होकर कहाँ से आता है सच बता
अगर मैं हूँ कमज़ोर तो आहिस्ता-आहिस्ता....
या इशारा कर हल्का सा छोड़ेगा साथ
कहाँ जैसे?
~गौरव चारस नेगी~
Saturday, 24 November 2018
Iss Paar Mai,Uss Paar Tum ( इस पार मैं,उस पार तुम )
तुम रूठ मत जाना
मुझे मुशिकल से साँस आती है इस ख्याल से भी,
पता है तुम हँस दोगी, थोड़ी देर में
कर लोगी सुलह अपने हाल से भी।
धीरे-धीरे फैलता मुझमें, कोई ज़हर
महज़ आँसू नहीं छलकता तुम्हारी आँखों से,
मैं ठीक उतना ही डरा सा हूँ
जितना गैरमौजूद हौसला तेरी बातों से।
दूरियों की लकीरों पर जमते-जमते परत
दीवार सी खड़ी होने लगी,
इस पार मैं,उस पार तुम,
पुकारो, कि गुमशुदी होने लगी।
तीन-चार दिन मिलना, हंस के मिलना,
कर तो लेते हो,
चेहरा बयाँ करता है
किस तकलीफ का बैठे गला रेते हो।
और साँस रोके मैं खड़ा
कर रहा इंतज़ार
मंज़िल के आने का,
नहीं!
हमसफर के छोड़ जाने का।
मुझे मुशिकल से साँस आती है इस ख्याल से भी,
पता है तुम हँस दोगी, थोड़ी देर में
कर लोगी सुलह अपने हाल से भी।
धीरे-धीरे फैलता मुझमें, कोई ज़हर
महज़ आँसू नहीं छलकता तुम्हारी आँखों से,
मैं ठीक उतना ही डरा सा हूँ
जितना गैरमौजूद हौसला तेरी बातों से।
दूरियों की लकीरों पर जमते-जमते परत
दीवार सी खड़ी होने लगी,
इस पार मैं,उस पार तुम,
पुकारो, कि गुमशुदी होने लगी।
तीन-चार दिन मिलना, हंस के मिलना,
कर तो लेते हो,
चेहरा बयाँ करता है
किस तकलीफ का बैठे गला रेते हो।
और साँस रोके मैं खड़ा
कर रहा इंतज़ार
मंज़िल के आने का,
नहीं!
हमसफर के छोड़ जाने का।
Friday, 4 May 2018
वो कारवां
वो कारवां निकल गया है दूर कहीं दूर....
ना दीदार में नशा रहा ना आंख में सुरूर।
साथ कोई चलता हो तो बेशक चले,
हार कर ताकि राह में लगा सकें गले,
उस गली जाना है जहाँ के गम मशहूर,
जहां होता नहीं नशा अगले रोज़ काफूर।
उम्र सी गुज़री पर ज़ेहन में ताजा ही रही
आंख भर भर मिलती रही वो छोटी सी कमी
क्या क्या ना करा गया इश्क़ का फितूर,
करीबी भी अचरज करें,के ऐसे भी हैं हुज़ूर।
हैं सिलवटों में अब भी उतनी ही करवटें ,
आखिर कोई बिस्तर तो हो जहां नींद भी बँटे,
हर पहलू हक़ीक़त है, वो ख्वाब सुदूर
शिकायत भी मैं करूँगा और जीना भी है ज़रूर।
ना दीदार में नशा रहा ना आंख में सुरूर।
साथ कोई चलता हो तो बेशक चले,
हार कर ताकि राह में लगा सकें गले,
उस गली जाना है जहाँ के गम मशहूर,
जहां होता नहीं नशा अगले रोज़ काफूर।
उम्र सी गुज़री पर ज़ेहन में ताजा ही रही
आंख भर भर मिलती रही वो छोटी सी कमी
क्या क्या ना करा गया इश्क़ का फितूर,
करीबी भी अचरज करें,के ऐसे भी हैं हुज़ूर।
हैं सिलवटों में अब भी उतनी ही करवटें ,
आखिर कोई बिस्तर तो हो जहां नींद भी बँटे,
हर पहलू हक़ीक़त है, वो ख्वाब सुदूर
शिकायत भी मैं करूँगा और जीना भी है ज़रूर।
(Shikayat bhi maine ki, jeeya bhi bharpur)
वो कारवां निकल गया है दूर कहीं दूर....
ना दीदार में नशा रहा ना आंख में सुरूर
वो कारवां निकल गया है दूर कहीं दूर....
ना दीदार में नशा रहा ना आंख में सुरूर
Wednesday, 22 November 2017
Fir ek chaah फिर एक चाह 😜
फिर एक चाह हो फिर एक आह निकले ,
रोज़-रोज़ की ख्वाहिश का तोड़ स्वाह निकले।
फिर कोई खुश दिखे और फिर जलन के मारे,
गर्ममिज़ाजी में सर्दी का एक और सप्ताह निकले।
खूब बाज़ार लगते गर ईमान ही बेचना होता,
शाम ढली ,सामान समेटा,दौड़े जिधर सुबह निकले।
तालियों से घबराई ,है जाँ पड़ी सकते में,
जान निकले मेरी जब किसी मुंह से वाह निकले ।
खैर मेरा दिल टटोलने ..है कलेजा तो आगे आ,
मेरी जेब से ही आए दिन आठ-दस शुबहा निकले ।
होते होते भूलने लगता है कि ग़ज़ल शुरू क्यों हुई?
कुछेक मिसरे तो सिरे से खामख्वाह निकले।
धर सिर माथे चारस जो तेरा लिखा आएगा पढ़ने
जिसकी बाहर ख़ुदपरस्ती से निगाह निकले।
कोई बताये मुझे वो फूंक मार-मार हाथों को
मेरी किताब के पन्ने पलट रहे थे,
सर्दियों में ये नशा काफी होगा
बाद में चाहे अफवाह निकले।
Thursday, 16 November 2017
इन पहाड़ों से Inn Pahado se
शहर की चमचमाती दीवारों में वो सुकून नहीं
जो गांव के जर्जर घर में है,
सब कुछ पा के भी ठगी सी ज़िन्दगी,
आज फिर वापसी के सफर में है।
इन पहाड़ों से हो मेरी शिनाख्त
तुमसे ज्यादा रूबरू हैं मेरे दर्द से ये दरख्त ,
निकलते वक्त
यहां की मिट्टी का रंग ले गया था बालों में,
मिला कर देख रहा हूँ आज
कितना बदल गया इन सालों में।
गीत पंसदीदा होते थे कुछ , धुन याद आये तो गाएँ
ये पहाड़ ये आसमाँ मेरे पन्ने मेरा कैनवस
यहीं रची थीं कुछ कविताएं,
और उकेरे थे ख्वाब बिन कम्पस!
लौट कर वैसे आज भी नहीं आया हूँ,
बस कुछ शहरी दोस्तों को गांव दिखाने लाया हूँ।
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